Puthra Prem: Munshi Premchand

बाबू चैतन्यदास का चरिन्न-चिन्नण-

पुन्न-प्रेम एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिस पर ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’ वाली कहावत चरितार्थ होती हैं। इस कहानी के प्रमुख पान्न बाबू चैतन्यदास जी है। वे पेशे से वकील है। तर्क-विर्तक में माहिर थे। उन्होंने अर्थशास्त्र पढ़ा था। धन कमाने की विद्या तो उनकी समझ में आती थी पर पैसो को खर्च करने की कला में भी वे माहिर थे। यदि किसी विशेष व्यक्ति अथवा वस्तु पर खर्च करने की बात होती तब वे उससे प्राप्त होने वाले लाभ-हानि पर विचार करते। यदि वह खर्च लाभ नही देता, तो वे उस खर्च का निर्दयता से गला दबा देते। एक भी पैसा व्यर्थ खर्च करना वे विषपान के समान समझते थे।

उनके दो पुन्न थे प्रभुदास और शिवदास। जब उन्हें पता चला कि उनका बड़ा बेटा एक ऐसे रोग से पीड़ित है जिसके ठीक होने की संभावना नही के बराबर है। पुन्न से बहुत अधिक प्रेम करने के बाद भी उन्हें लगा कि उसके पीछे पैसा बर्बाद करना ठीक नही है। डा0 के कहने के बाद भी कि इटली के सेनेटोरियम में भेज देने से वह ठीक हो सकता है। पर उनका कहना था “इटली में ऐसी कोई संजीवनी नही रखी है, जो तुरन्त चमत्कार दिखाएगी”

उन्हें कंजूस नही कहा जा सकता है पर उनकी मनोवृत्ति अर्थशास्त्र पढ़ने के कारण पूँजीवादी हो गई थी। एक बार पत्नी की सम्पत्ति के आधे हिस्से की बात करने पर उन्होंने कहा आधा नही मैं उसे सर्वस्व दे देता जब उससे कुछ आशा होती। मै केवल भावुकता के फेर में पड़कर धन का ह्रास नही कर सकता

यद्यपि पुन्न की मृत्यु के बाद उन्हे बहुत दुख हुआ था और अपने ऊपर ग्लानि और पश्चात्ताप भी हुआ था। इस ग्लानि और दुख को दूर करने के लिए अंत में उन्होंने प्रभुदास के अंतिम संस्कार पर हजारो रुपए खर्च कर डाले। शायद मन की शान्ति के लिए। बाबू चैतन्यदास यथार्थ की सीढ़ियो पर चढ़ते हुए अंत में आदर्श के स्थान पर पहुँच जाते हैं। उनका आदर्श अनुकरणीय था।