Gauri: Subhadra Kumari Chauhan

  1. गौरी के विवाह की चिंता माता-पिता को क्यों थी और उसके लिए क्या-क्या प्रयास किए गए

उ0- गौरी सुभद्रा कुमारी चौहान की एक बहु चर्चित कहानी है। गौरी कहानी के पान्नो में सजीवता है। गौरी इस कहानी की मुख्य पान्न हैं। उसका सीधा सम्बन्ध उसके पिता राधाकृष्ण जी तथा माता कुन्ती से है। गौरी एक सुंदर एंव सुयोग्य उन्नीस वर्ष की बालिका थी। उसके पिता के पास दहेज देने के लिए यद्येष्ट धन नही था, जिसके कारण विवाह में उड़चन आ रही थी। अपने माता-पिता की चिन्ता को वह समझती थी इसी कारण वह स्वंय को अपशाधिनी समझती थी।

गौरी के विवाह की चर्चा चल रही थी। गौरी के पिता बाबू राधाकृष्ण गौरी के लिए लड़का देखने गए थे। सीताराम जी को जिनकी आयु पैतीस-छत्तीस साल की थी तथा उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। उनके दो छोटे बच्चे थे। आय तीस रुपये मासिक थी। सादा रहन-सहन और पहनावा था। वास्तव में वे स्वंय विवाह करना नही चाहते थे अपितु बच्चो के लिए माँ चाहते थे। उनके विषय में बाबू राधाकृष्ण का कहना था “वह आदमी कपटी नही हैं। उसके भीतर कुछ और बाहर कुछ हो ही नही सकता। ह्रदय तो उसका दर्पण के समान साफ हैं।“

पर गौरी की माँ को यह रिश्ता पंसद नही था। इस कारण राधा कृष्ण ने बेटी के लिए नया वर खोज लिया पर गौरी सीताराम जी के गुणो पर मुग्ध हो गई थी और उससे ही विवाह करना चाहती थी। दूसरा वर नायब तहसीलदार जिन्हे अपने आराम अपने ऐश के लिए ब्रिटिश गवर्नमेट के इंगित मान्न पर देशवासियो के गले में छुरी फेरने में जरा भी संकोच नही था। इस कारण गौरी को तहसीलदार के घृणा हो गई विवाह से पहले तहसीलदार के पिता की मृत्यु हो गई और विवाह एक वर्ष के लिए टल गया।

जब गौरी को पता चला कि सीताराम जी जेल में हैऔर उनके बच्चे अकेले है तब उसने अपना कत्वर्य निश्चित कर लिया और वह अपनी माँ से जिद करके बच्चो के पास पहुँच गई और उनकी माँ बन गई।